कोरबा 5 नवंबर 2026। नगर निगम कोरबा में इन दिनों विकास कार्यों की रफ्तार से ज्यादा चर्चा अफसरों और जनप्रतिनिधियों के बीच बढ़ती तल्खी की हो रही है। निगम की बैठकों में विकास के प्रस्ताव भले सर्वसम्मति से पास हो रहे हों, लेकिन पर्दे के पीछे सहमति का गणित बिगड़ता दिखाई दे रहा है। बुधवार को हुई मेयर इन काउंसिल की बैठक में महापौर संजूदेवी राजपूत और निगम आयुक्त आशुतोष पांडेय के बीच ऐसी तकरार हुई कि बैठक में मौजूद लोग कुछ देर के लिए स्तब्ध रह गए। बताया जा रहा है कि बात जिले से हटने और हटाने तक पहुंच गई। आखिरकार एमआईसी सदस्यों और मंत्री के भाई को बीच-बचाव करना पड़ा।
जानकारी के मुताबिक नगर निगम के पंडित जवाहरलाल नेहरू सभागार स्थित एमआईसी कक्ष में बुधवार को महापौर संजूदेवी राजपूत की अध्यक्षता और आयुक्त आशुतोष पांडेय की मौजूदगी में बैठक आयोजित की गई थी। एजेंडे में शहर के विकास और निर्माण कार्य, नागरिक सुविधाएं और अन्य प्रस्ताव शामिल थे। बताया गया कि कई प्रस्तावों को सर्वसम्मति से मंजूरी भी दी गई। लेकिन बैठक का असली तापमान तब बढ़ा, जब निगम के कामकाज और अधिकारियों की भूमिका को लेकर महापौर और आयुक्त आमने-सामने आ गए। बैठक में जिस तरह संवाद तल्ख हुआ, उससे निगम के भीतर चल रही खींचतान एक बार फिर सामने आ गई। सूत्रों के मुताबिक, विवाद इतना बढ़ा कि बात एक-दूसरे के खिलाफ सख्त रुख अपनाने और जिले से हटाने तक पहुंच गई।
स्थिति बिगड़ती देख एमआईसी सदस्य नरेंद्र देवांगन और अन्य सदस्यों ने हस्तक्षेप किया। उनके बीच-बचाव के बाद मामला शांत हुआ। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस एमआईसी का काम शहर के विकास की दिशा तय करना है, वहां चर्चा विकास से आगे बढ़कर अफसरों और जनप्रतिनिधियों के बीच अधिकारों की खींचतान तक क्यों पहुंच रही है ? क्या निगम में फैसलों को लेकर तालमेल की कमी है या फिर हर बड़े काम के पीछे अलग-अलग हितों का टकराव है ?
एक इंजीनियर और ठेकेदार ने बढ़ा दी सियासी गर्मी
विवाद की एक वजह निगम के इंजीनियर पीयूष राजपूत को लेकर भी बताई जा रही है। जानकारी के मुताबिक, बुधवारी बाजार मार्ग पर डिवाइडर निर्माण के दौरान सड़क पर रेत और मलबा फैलने से दुर्घटना की आशंका जताते हुए इंजीनियर ने ठेकेदार को इसे हटाने का निर्देश दिया था। आरोप है कि ठेकेदार ने निर्देश को गंभीरता से नहीं लिया। इसके बाद सड़क पर फैली रेत के कारण एक राहगीर की गाड़ी फिसल गई और वाहन चालक गंभीर रूप से घायल हो गया। बताया जाता है कि घटना के बाद इंजीनियर ने ठेकेदार के साथ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। इसी मुद्दे को लेकर महापौर ने एमआईसी की बैठक में नाराजगी जताई और आयुक्त से संबंधित इंजीनियर के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। इस पर आयुक्त और महापौर के बीच फिर बहस की स्थिति बन गई।
करोड़ों के सड़क ठेके और डामर की महंगाई का गणित
नगर निगम में बढ़ते तनाव के पीछे सड़क निर्माण के बड़े ठेकों का मुद्दा भी चर्चा में है। शहर की जर्जर सड़कों के लिए करोड़ों रुपये की निविदाएं जारी की गई हैं। लेकिन बताया जा रहा है कि सड़क निर्माण के बड़े ठेकों के बाद अब डामर की बढ़ती कीमतों का हवाला देकर ठेकेदार अपनी मुश्किलें गिना रहे हैं। वहीं निगम के गलियारों में ठेकों के साथ चलने वाले कथित ‘सिस्टम‘ और उसके हिसाब-किताब को लेकर भी चर्चाएं गर्म हैं। ठेकेदारों की ओर से कथित ‘सिस्टम‘ के पालन में हामी नहीं भरने की चर्चाओं ने जनप्रतिनिधियों और अफसरों के बीच तल्खी बढ़ा दी है। गौरतलब है कि कोरबा नगर निगम में विपक्ष पहले से ही विकास कार्यों और निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठा रहा है। अब सत्तापक्ष के भीतर महापौर और आयुक्त के बीच MIC की बैठक में सामने आई कथित तकरार ने नई चर्चा छेड़ दी है।
एक तरफ जनप्रतिनिधि अधिकारियों से जवाबदेही चाहते हैं, तो दूसरी तरफ अफसर नियमों और गुणवत्ता के नाम पर अपने तरीके से काम कराने की बात कर रहे हैं। विडंबना यह है कि शहर को बेहतर सड़कें, साफ-सफाई और नागरिक सुविधाएं चाहिए, लेकिन निगम की राजनीति में चर्चा इस बात पर ज्यादा हो रही है कि किसकी बात मानी जाएगी और किसका आदेश चलेगा। फिलहाल एमआईसी की बैठक खत्म हो चुकी है और विवाद भी शांत करा दिया गया है। लेकिन सवाल अब भी कायम है—क्या यह सिर्फ एक बैठक में हुई बहस थी या कोरबा नगर निगम में जनप्रतिनिधियों और अफसरशाही के बीच बढ़ती दूरी का संकेत? शहर की जनता को आपसी तकरार नहीं, जमीन पर विकास चाहिए। आखिरकार निगम की असली परीक्षा बैठक में पास हुए प्रस्तावों से नहीं, बल्कि शहर की सड़कों और नागरिक सुविधाओं में दिखने वाले बदलाव से होगी।


