बिलासपुर 28 जुलाई 2026। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित सर्पदंश मुआवजा घोटाले में कार्रवाई अब प्रशासनिक और कानूनी दोनों स्तरों पर तेज होती दिख रही है। पुलिस की गिरफ्त में आए तीन राजस्व लिपिकों को निलंबित कर दिया गया है। दूसरी ओर कार्रवाई के तरीके को लेकर राजस्व कर्मचारी संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है। कर्मचारियों का आरोप है कि पुलिस वास्तविक दोषियों तक पहुंचने के बजाय निचले स्तर के कर्मचारियों को निशाना बना रही है। इस मुद्दे को लेकर बिलासपुर में सोमवार को जिलेभर की तहसीलों में कामकाज ठप रहा।
पुलिस की जांच में अब तक सामने आया है कि सर्पदंश मुआवजे के नाम पर एक संगठित नेटवर्क वर्षों से सरकारी खजाने में सेंध लगा रहा था। आरोप है कि सामान्य मौत के मामलों की मर्ग फाइलें आरटीआई के जरिए हासिल की जाती थीं। इसके बाद फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट, जाली सील और कूटरचित दस्तावेज तैयार कर मौत का कारण सर्पदंश दिखाया जाता था। मुआवजा स्वीकृत होने के बाद लाखों रुपये की राशि दलालों, बिचौलियों और अन्य लोगों के बीच बांट ली जाती थी। पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क की वित्तीय लेन-देन और बैंक खातों की भी जांच कर रही है।
इसी मामले में गिरफ्तार तहसील कार्यालय के लिपिक नरेंद्र कौशिक, गरीबराम बिंझवार और हरिशंकर को निलंबित कर दिया गया है। इसके विरोध में छत्तीसगढ़ प्रदेश राजस्व लिपिक संघ, राजस्व पटवारी संघ और अधिकारी-कर्मचारी फेडरेशन ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। संगठनों का कहना है कि दस्तावेजों की सत्यता की जांच करना न तो लिपिकों का अधिकार है और न ही पटवारियों का दायित्व। उनका तर्क है कि फर्जी सील और दस्तावेजों के आधार पर यदि किसी ने न्यायालय को गुमराह किया है, तो वास्तविक जालसाजों पर कार्रवाई होनी चाहिए, न कि प्रक्रिया का हिस्सा रहे कर्मचारियों को सीधे आरोपी बनाया जाए।
सोमवार को कर्मचारियों ने काम बंद कर कलेक्टर और पुलिस महानिरीक्षक को ज्ञापन सौंपा। उन्होंने निष्पक्ष विभागीय जांच समिति गठित करने और पुलिस की कथित एकतरफा कार्रवाई की समीक्षा की मांग की। कलेक्टर द्वारा विभागीय जांच का आश्वासन दिए जाने के बाद कर्मचारियों ने प्रस्तावित तीन दिवसीय हड़ताल वापस ले ली, हालांकि पूरे दिन तहसीलों का कामकाज प्रभावित रहा। इस बीच पुलिस का कहना है कि जांच लगातार आगे बढ़ रही है। सरकंडा, सिविल लाइन, कोनी, सिरगिट्टी और तोरवा समेत कई थाना क्षेत्रों में फर्जी मुआवजा प्रकरण दर्ज किए जा चुके हैं। बैंक खातों, कॉल डिटेल और दस्तावेजों की फॉरेंसिक जांच के जरिए पूरे गिरोह की कड़ियां जोड़ी जा रही हैं।
सर्पदंश मुआवजा घोटाला अब केवल आर्थिक अपराध का मामला नहीं रह गया है, बल्कि इसने प्रशासनिक जवाबदेही और जांच की निष्पक्षता पर भी बहस छेड़ दी है। एक ओर सरकार सरकारी धन के कथित दुरुपयोग पर सख्त कार्रवाई का संदेश देना चाहती है, वहीं दूसरी ओर कर्मचारी संगठन यह सवाल उठा रहे हैं कि जांच की आड़ में कहीं जिम्मेदारी तय करने का दायरा केवल निचले कर्मचारियों तक तो सीमित नहीं किया जा रहा। आने वाले दिनों में यह जांच और इससे जुड़ा प्रशासनिक विवाद दोनों ही राज्य की राजनीति और नौकरशाही के लिए अहम मुद्दा बने रह सकते हैं।

