भोपाल 16 जुलाई 2026। मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में कथित फर्जीवाड़े का एक मामला सामने आने के बाद विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। रीवा लोकायुक्त द्वारा रिश्वत लेते हुए पकड़े गए संविदा डॉक्टर महेश चंद शर्मा के सेवा रिकॉर्ड की जांच में आरोप है कि वे एक ओर शहडोल में पदस्थ थे, जबकि दूसरी ओर श्योपुर जिले से भी वर्षों तक संविदा डॉक्टर के तौर पर वेतन लेते रहे। मामले के सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने जांच शुरू कर दी है।
लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद डॉक्टर महेश चंद शर्मा के सेवा रिकॉर्ड खंगाले गए, तो आरोप सामने आया कि वे शहडोल में सेवाएं दे रहे थे, लेकिन उनका नाम श्योपुर जिले के विजयपुर क्षेत्र स्थित सेहसराम प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भी संविदा डॉक्टर के रूप में दर्ज था। आरोप है कि वर्ष 2021 से उन्हें वहां से नियमित वेतन भी जारी होता रहा। यदि जांच में यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि एक डॉक्टर की दो अलग-अलग जिलों में पदस्थापना कैसे दर्ज रही और बिना वास्तविक सेवा के वेतन भुगतान कैसे होता रहा ?
यह मामला केवल एक कर्मचारी तक सीमित नहीं, बल्कि सरकारी निगरानी व्यवस्था और सत्यापन प्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है।स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों के अनुसार, डॉक्टर का नाम अन्य जिलों से जुड़े रिकॉर्ड में भी होने की आशंका पर जांच की जा रही है। हालांकि, इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। विभाग का कहना है कि सभी तथ्यों की जांच के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब प्रदेश के कई सरकारी अस्पताल डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे हैं।
ऐसे में यदि एक ही डॉक्टर अलग-अलग जिलों में कागजों पर पदस्थ रहकर वेतन प्राप्त करता रहा, तो इससे स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी और वित्तीय अनुशासन दोनों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। रीवा लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद अब स्वास्थ्य विभाग पूरे मामले की जांच कर रहा है। जांच के निष्कर्षों से यह स्पष्ट होगा कि यह केवल एक व्यक्ति की कथित अनियमितता थी या फिर विभागीय स्तर पर निगरानी की बड़ी चूक भी इसमें शामिल है। फिलहाल यह मामला मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर नई बहस का कारण बन गया है।

